14/06/2019

जानिए कौन थे महाराजा सुहेलदेव, जिसने चीर दी थी गाजी बाबा की छाती

भारतीय योद्धा महराजा सुहेलदेव पासी की बात आती है तो बहराईच का नाम भी आता है क्यूंकि भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा-बहराइच जिलों की सीमा पर एक प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ स्थान है इसका नाम है श्रावस्ती। हालाँकि वर्तमान में इसका नाम बदल चुका है. गोंडा-बलरामपुर से 12 मील पश्चिम में आज का सहेत-महेतगाँव ही श्रावस्ती है। प्राचीन काल में यह कौशल देश की दूसरी राजधानी थी भगवान श्रीराम के पुत्र लव ने इसे अपनी राजधानी बनाया था।

श्रावस्ती बौद्ध व जैन दोनों का तीर्थ स्थान है। तथागत बौद्ध दीर्घ काल तक श्रावस्ती में रहे थे। अब यहाँ बौद्ध धर्मशाला, मठ और मन्दिर हैं। महराजा सुहेलदेव राजभर जिन्हें कई बार महराजा सुहेलदेव पासी भी कहा जाता है वो कई वर्षो पहले इसी श्रावस्ती के सम्राट हुआ करते थे.

महाराजा सुहेलदेव

महाराजा सुहेलदेव कौन थे

सुहेलदेव श्रावस्ती के राजा के सबसे बड़े पुत्र थे। सुहेलदेव के सभी भाइयों में तय किया की वे अपने बड़े भाई सुहेलदेव के नेतृत्व में राज्य और जनता की सेवा में काम करेंगे. इसके बाद समय आने पर सुहेलदेव को राजा बना दिया गया. ये वो दौर था जा भारत पर लगातार विदेशो से मुस्लिम द्वारा हमले किये जा रहे थे.

उस समय के हालत भी कुछ आज के जैसे ही थे भारत के कुछ लालची राजनीतिज्ञ और राजा उन मुग़लों (मुस्लिमो) को भारत में भाई चारा बढाने के नाम पर आने दे रहे थे.

सैयद सलार मसूद गाजी

मुस्लिम हमलावर महमूद गजनवी के भतीजे ने सिन्धु नदी को पार करके धोखे से हमला किया इसके लिए पहले उसने हिन्दू राजाओं से शरण मांगी और फिर धीरे धीरे जनता के बीच अपने ही सिपाहियों के रहने के लिए भारतियों के घरों पर ही बल से कब्ज़ा कर लिया.

अब सैयद सलार गाजी भारतियों के बीच रहकर उन्हें ही मार रहा था. मौका मिलते ही उसने एक एक करके पहले मुल्तान फिर दिल्ली और फिर मेरठ को हथिया लिया. सतरीख पर भी सैयद सलार मसूद ने अपनी धोखेबाज़ निति से कब्ज़ा कर लिया.

इसके मुस्लिम सैनिक पहले भारतीय लोगो की बस्ती में मदद मांगने के बहाने घुस जाते थे क्यूंकि इन्हें पता था की भारतियों को दया बहुत आती है.

महाराजा सुहेलदेव का नाम सलार मसूद गाजी के साथ क्यूँ जुड़ा

सलार मसूद के आतंक से भारतीय जनता को बचाने के लिए तमाम हिन्दू राजा एक जुट हो रहे थे मगर सलार मसूद की सैन्य शक्ति काफी जयादा थी क्यूंकि वो महमूद गजनवी का सेनापति था और उसका भतीजा भी. इसलिए उसकी खुद की सेना और महमूद गजनवी की सेना मिलकर काफी बड़ी सेना हो जाती थी. इतना ही नहीं उसने तलवार के दम पर अनेको भारतियों को भी मुस्लिम (इस्लामिक सैनिक) बना दिया था अब वो भी उसकी सेना का हिस्सा थे.

जब सलार मसूद को पता चला की हिन्दू राजा उसे दंड देने के लिए एकजुट हो रहे हैं तो वो बहराईच में सेना लेकर आया तब तक यहाँ पर महाराजा सुहेलदेव को राजा बनाया जा चूका था. सुहेलदेव एक कुशल योद्धा और जनता की फ़िक्र करने वाले राजा था.

सन् 1034 में महाराजा सुहेलदेव और सलार मसूद के बीच आमना सामना होने का समय आ गया. सलार मसूद ने जनता के बीच में अपनी सेना डालने की कोशिश करनी चाही मगर इस बार मुकाबला करने के लिए कोई और नहीं बल्कि सुहेलदेव थे और उन्होंने सलार मसूद की इस चाल को सफल नहीं होने दिया. इसलिए अब युद्ध सेनाओ के बीच हो रहा था. महाराजा सुहेल देव और मुस्लिम आक्रमणकारी सलार मसूद के बीच भी लडाई चल रही थी इस बीच सुहेलदेव ने अपनी तलवार के एक तेजवार से सलार मसूद गाजी की छाती चीर दी.

इस तरह उस हमलावर सलार मसूद का अंत हो गया, इतिहास की इस घटना को जाने वाले भारतीय लोग आज भी महाराजा सुहेलदेव के गुणगान करते नहीं थकते हैं.

सलार मसूद गाजी उर्फ़ गाजी बाबा

सलार मसूद को बहराइच में दफनाया दिया गया और सन् 1035 में वहाँ उसका महिमामंडन करने के राजनितिक उद्देश्य से कुछ मुस्लिम मौलानाओ ने एक दरगाह बना दी थी क्यूंकि मुस्लिम राजनीतिज्ञों का मानना था की इस तरह गाजी सलार मसूद को हमेशा जिन्दा रखा जा सकेगा असल में सभी जानते थे की भारतीय समाज अपने दुश्मनों के भी धार्मिक स्थान को नष्ट नहीं करता.
सलार मसूद की बहराईच स्थित दरगाह में उसे हजरत सलार मसूद गाजी बाबा के नाम से जाना जाता है.
जानकरी में पाया गया की जिस जगह मसूद की दरगाह है उसकी असली कब्र वहा नहीं बल्कि वहां से कुछ दुरी पर थी और इस जगह पर पहले हिंदू संत और ऋषि बलार्क का एक आश्रम था और फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के द्वारा उसे दरगाह में बदल दिया गया। वर्तमान समय में इतिहास न जाननें वाले कुछ भारतीय लोग भी सलार मसूद की कब्र पर माथा टेकने जाते हैं.